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सिलवटों से भरा ख़त

"ये रात मैं नहीं गुज़रने दूँगा। आज मैं लिखता रहूँगा। लिखता ही जाऊँगा। ये लिखना दरअसल तुम्हें तराशना है। तुम जो मेरी हो, आज़ाद हो, मगर बंधी हुई हो रिश्तों की अजीब-सी रस्सियों से। ये रस्सियाँ लोहे की ज़ंजीरों से ज़्यादा मज़बूत हैं। इन्हें पिघलाने का ख़याल तुम्हें नहीं आता और न कभी आ सकता है, क्योंकि तुम्हें इन रस्सियों से इश्क़ है। ये रस्सियाँ ही अब तुम्हारी शनाख़्त हैं।"

अफ़ग़ान लेखक रहनवर्द ज़रयाब की कहानी ‘निबन्ध’

हिन्दी अनुवाद: श्रीविलास सिंह

किताब अंश: अनसोशल नेटवर्क

"क्या आपने सोशल मीडिया में अपना नाम और अपनी तस्वीर पोस्ट कर दी है और वे वास्तविक हैं? क्या आपने सोशल मीडिया में अपना सम्पर्क पता, फ़ोन नम्बर और ईमेल सार्वजनिक किया हुआ है? अगर हाँ तो आपको चिन्तित हो जाना चाहिए। आप सिर्फ़ यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि यह सब शेयर करनेवाले आप अकेले नहीं हैं।"

किताब अंश : 'जीते जी इलाहाबाद'

"ताज्जुब यही कि जब हम शहर में जी रहे होते हैं तब उसकी ख़ूबी हमें पता नहीं चलती लेकिन जब वहाँ से बोरिया-बिस्तर उठ जाता है तब वह हमारे मन में बस जाता है ख़ुशबू की तरह, उसका नाम लेते ही यादों के रोशनदान खुल जाते हैं।"

सुजाता के उपन्यास 'एक बटा दो' की समीक्षा

"औरतों की आज़ादी को लेकर तमाम दावों की सच्चाई यह है कि घर में माँ-बाप, भाई, रिश्तेदार अपनी बेटियों, बहनों को हमेशा यह जताते हैं कि देखो तुमको पढ़ने दे रहे हैं, पति यह जताता है कि नौकरी करने दे रहे हैं। यह भाव किस दृष्टिकोण से आज़ादी का सूचक है?"

ली मिन-युंग की कविताएँ

कविता संग्रह 'हक़ीक़त के बीच दरार' से।

संध्या चौरसिया की कविताएँ

"मैं चाहती हूँ
तुम्हारी बनती चेतना में हो
बस इतनी सच्चाई
कि तुम्हारा ख़ूबसूरत कहना
मुझे कोई अपशब्द-सा लगना बन्द हो जाए।"

Twelve Years A Slave | Akkad Bakkad Episode #10

पोषम पा के पॉडकास्ट अक्कड़ बक्कड़ में सुनिए विजय, सहज और पुनीत को बात करते हुए दो फ़िल्मों पर, जो एक ही किताब 'ग़ुलामी के बारह साल' पर आधारित हैं। ये फ़िल्में हमें बारह साल के उस काल-खण्ड में ले जाती हैं, जिसमें सोलोमन नोरथप नाम के अफ़्रीकी-अमेरिकी व्यक्ति को ग़ुलाम बनाकर क़ैद रखा जाता है। साथ ही ये फ़िल्में हमें सोलोमन की आज़ादी से ग़ुलामी और फिर से आज़ादी तक की इस यात्रा की भयावह तस्वीरें दिखाती चलती हैं!

यदि आप महिला हैं, और लिखती हैं, तो दो बातें होंगी

"स्त्री-लेखन साहित्य में अपनी जगह लेने आया है, किसी और की नहीं। जो आक्रान्त हैं, उन्हें यह आरक्षण की माँग लग सकती है। लेकिन यह उतना ही सहज है जैसे घर की किसी महिला का रसोई से निकलकर सोफ़े पर आकर बैठना और चाय पर चर्चा में भाग लेते हुए अपनी बात कहना। अगर घर के लोगों को यह लगे कि रसोई ही उसकी जगह थी और सोफ़े पर बैठने की इच्छा आरक्षण माँगना है, तो उसका कुछ किया नहीं जा सकता।"

प्रियम्वद की कहानी 'पलंग' | पाठ- परीक्षित

"माँ की यह स्थिति मेरे अन्दर हमेशा विचित्र-सी जुगुप्सा पैदा कर देती। मैं चाहता था, उसे इस तरह अव्यवस्थित होने से रोकूँ, अपनी घृणा व्यक्त करूँ, पर मैं उससे कुछ स्पष्ट नहीं कह पाता था। यह माँ की वर्षों की दिनचर्या थी। मुझे लगता था कि कुछ भी कहने पर वह अचानक इतनी लज्जित और असहज हो जाएगी कि उसके जीवन का पूरा संतुलन नष्ट हो जाएगा। वह सब जो इतनी आश्वस्ति और निश्चिन्तता के साथ करते हुए सहज जीवन जीती है, बिखर जाएगा।"

गुलज़ार के उपन्यास 'दो लोग' पर बातचीत | अक्कड़ बक्कड़ एपिसोड #9

पोषम पा के पॉडकास्ट 'अक्कड़ बक्कड़' के नवें एपिसोड में, सुनें गुलज़ार के उपन्यास 'दो लोग' पर बात करते हुए, सहज अज़ीज़, पथिक और पुनीत कुसुम को। भारत-पाकिस्तान के बँटवारे की पृष्ठभूमि पर लिखा गया यह उपन्यास हमें उन परिस्थितियों से अवगत कराता है जो किसी भी देश में पनपती-फैलती साम्प्रदायिकता के बीच उस देश के आम नागरिकों को झेलनी पड़ती हैं।

शाम-ए-नज़्मगोई | Artists Registeration

Call For Poets

शाम-ए-नज़्मगोई | 20 अगस्त

With Forbidden Verses and Posham Pa

अंश: हम सभी को फ़ेमिनिस्ट होना चाहिए

"तुम ख़्वाब देखो लेकिन बहुत ऊँचे नहीं। तुम सफल होने की इच्छा तो रखो लेकिन बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी करने की नहीं, वरना तुम मर्दों को भयभीत कर दोगी। अगर एक मर्द के साथ अपने रिश्ते में कमानेवाली व्यक्ति तुम हो, तब भी ऐसे पेश आओ कि तुम नहीं हो, ख़ास तौर पर दुनिया के सामने, वरना तुम अपने पति को नामर्द साबित कर दोगी।"

सुजाता के उपन्यास 'एक बटा दो' से उद्धरण

“क्यों मैं ही दुनिया के योग्य बनने की कोशिश करती रहूँ, मेरे होने की क़ीमत दुनिया न चुकाए?”

अक्कड़ बक्कड़ | एपिसोड #8 | सुजाता का उपन्यास 'एक बटा दो'

In the eighth episode of Akkad Bakkad, a podcast by Posham Pa, tune in to listen to Sahej Aziz and Puneet Kusum discussing the novel 'Ek Bata Do' written by Sujata. The book explores the tricky terrain that is revealed to women through the journey of married life. Through the life stories of the women depicted in the novel, Sahej and Puneet also discuss everyday forms of patriarchy, viewed from the location of heterosexual men.

पोषम पा के पॉडकास्ट 'अक्कड़ बक्कड़' के आठवें एपिसोड में, सुनें सुजाता द्वारा लिखित उपन्यास 'एक बटा दो' पर बात करते हुए, सहज अज़ीज़ और पुनीत कुसुम को। यह पुस्तक उन मुश्किल क्षणों की पड़ताल करती है जो वैवाहिक जीवन की यात्रा के मध्य स्त्रियों के सामने आते हैं। उपन्यास में चित्रित स्त्रियों की जीवन-कथाओं के माध्यम से, सहज और पुनीत पुरुषों की लोकेशन से दिखने वाले पितृसत्ता के विभिन्न स्वरूपों पर भी चर्चा करते हैं।

कमला दास की कविता 'परिचय'

"जब मैंने प्रेम माँगा
उस वक़्त मैं नहीं जानती थी इसके अलावा माँगा क्या जाए?"

शेरनी | अक्कड़ बक्कड़ एपिसोड #7

अक्कड़ बक्कड़ के सातवें एपिसोड में सुनिए विद्या बालन अभिनीत नयी फ़िल्म 'शेरनी' पर एक चर्चा—शिवा, सोनल और सहज अज़ीज़ के साथ।

प्रेमचंद की जीवनी 'कलाम का सिपाही' से एक अंश

"मेरे पास अपना कुछ नहीं है, जो कुछ है उन हवाओं का है जो मेरे भीतर बजीं। मेरी कहानी तो बस उन हवाओं की कहानी है, उन्हें जाकर पकड़ो। मुझे क्यों तंग करते हो!"

विजय सिंह के उपन्यास 'जया गंगा' का एक अंश

"जया

पतझड़ तुम्हारे साथ आया था और तुम्हारे साथ ही चला गया। वह तुममें ही खो गया। तुम हमेशा की तरह उसकी अकेली विश्वासपात्र रहोगी जिस पर वह अपने भेद खोलता रहेगा।"

वीडियो: रूपम मिश्रा की कविता 'फँसी हुई लड़कियाँ'

पाठ एवं वीडियो : पूजा शाह

मृदुला गर्ग के उपन्यास 'चित्तकोबरा' से उद्धरण

"ख़ुदा को मख़ौल की सख़्त ज़रूरत है। लोगों को चाहिए, दिल खोलकर ख़ुदा का मख़ौल उड़ाएँ। तभी वह आसमान से उतरकर ज़मीन पर आ सकता है।"

किताब अंश: साधारण लोग असाधारण शिक्षक - एस. गिरिधर

क्या सरकारी स्कूलों के शिक्षकों में अपने काम को लेकर प्रतिबद्धता व्यापारिक (निजी) क्षेत्र के कर्मचारियों से भी कम है? एक ऐसे दौर में यह सवाल थोड़ा बेवक़ूफ़ाना जान पड़ता है जब सरकारी स्कूल के शिक्षक को हमारी शिक्षा व्यवस्था की हर असफलता के लिए ज़िम्मेदार खलनायक और निजी क्षेत्र को मेहनत व लगन का पर्याय माना जा चुका है। लेकिन हमने बड़ी मुश्किल से यह सबक सीखा है कि बेवक़ूफ़ाना सवाल न सिर्फ़ पूछे जाने चाहिए बल्कि उनके जवाब भी दिए जाने चाहिए। क्या सितारे और सूरज वाक़ई धरती के चारों तरफ़ घूमते हैं? क्या हैजे की महामारियों के पीछे वाक़ई ‘चुड़ैलों’ का हाथ होता था?

अक्कड़ बक्कड़ | एपिसोड #6 : 'जादू का कालीन'

मृदुला गर्ग द्वारा लिखा गया नाटक 'जादू का कालीन' का मुख्य विषय है बाल मज़दूरी और यह तथ्य कि कैसे कुछ उद्योग बच्चों के शोषण पर टिके हुए हैं। नाटक में जहाँ एक तरफ़ जादू का कालीन बच्चों की कल्पनाओं और उनके एक सुन्दर भविष्य का रूपक है, वहीं उनके शोषण का प्रतीक भी। इसी नाटक पर बातचीत की है पुनीत कुसुम और सहेज अज़ीज़ ने, पोषम पा के पॉडकास्ट अक्कड़ बक्कड़ के छठे एपिसोड में। ज़रूर सुनें!

शिवेन्द्र के उपन्यास 'चंचला चोर' से उद्धरण

"क्या यह हमारा कर्त्तव्य नहीं बनता कि हम अपनी माँ को शुरू से जानें―उनके बचपन से, जैसे कि वह हमें हमारे बचपन से जानती है?"

लेख: 'तुम्हारे सदाचार की क्षय' - राहुल सांकृत्यायन

“सदाचार में जो जितना ही पतित है, वह उतना ही अधिक सुन्दर लच्छेदार शब्दों में उस पर व्याख्यान दे सकता है।”

जीतेन्द्र, घुघरी और वीकेण्ड

नयी हिन्दी किताब 'ज़ीरो पीरियड' से अविनाश सिंह तोमर की कहानी।

किताब अंश: 'नारीवादी निगाह से' - निवेदिता मेनन

"माधुरी दीक्षित बहुत हैरत से पूछती है कि दीदी, ये बच्चा किसका है? एक तरह से देखें तो यह सवाल ही बेतुका और ग़ैर-ज़रूरी है क्योंकि अगर बच्चा उसके शरीर के अन्दर है तो ज़ाहिर-सी बात है बच्चा उसी का होगा। लेकिन एक पितृसत्तात्मक समाज (केवल पितृसत्तात्मक समाज में ही) में यह बेतुका सवाल कि—बच्चे का बाप कौन है, पूरी तरह जायज़ माना जाता है।"

संजय छीपा की कविताएँ

'तुम्हारे भगवान की क्षय'

लेख: राहुल सांकृत्यायन

मिलेना को लिखे काफ़्का के पत्रों के कुछ अंश

अनुवाद: लाखन सिंह

'मंटो अव्वल दर्जे का फ़्रॉड है'

आत्मकथ्य: मंटो

'अलगोज़े की धुन पर' : प्रेम के परिपक्व रंगों की कहानियाँ

टिप्पणी: देवेश पथ सारिया

बिखरा-बिखरा, टूटा-टूटा : कुछ टुकड़े डायरी के

गौरव भारती

अक्कड़ बक्कड़: 'अ सीरियन लव स्टोरी'

किसी देश में व्याप्त राजनैतिक संकट न केवल उस देश के नागरिकों के अधिकारों, सुरक्षा और स्वतंत्रता पर प्रभाव डालता है, बल्कि उनके निजी जीवन में भी एक भारी घुसपैठ करता है। राग़दा और आमिर सीरिया के ऐसे ही दो नागरिक हैं, जिनकी प्रेम कहानी प्रत्यक्ष तौर पर सीरिया की राजनैतिक परिस्थितियों की भेंट चढ़ जाती है, जिसका चित्रण शॉन मैकलिस्टर की डाक्यूमेंट्री 'अ सीरियन लव स्टोरी' में देखने को मिलता है। अक्कड़ बक्कड़ के पाँचवे एपिसोड में सुनिए इसी डाक्यूमेंट्री पर एक बातचीत।

In the fifth episode of Akkad Bakkad, a podcast by Posham Pa, listen to Puneet Kusum and Sahej Aziz as they discuss 'A Syrian love story', a documentary film that portrays complex human emotions, relationships, aspirations in a conflict-torn space, through the story of Raghda and Amer. The documentary is directed by British filmmaker Sean Mcallister.

'तुम्हारे धर्म की क्षय'

लेख: राहुल सांकृत्यायन

सआदत हसन मंटो की कहानी 'नंगी आवाज़ें'

पाठ: पुनीत कुसुम

जिम जारमुश् की फिल्म ‘पैटर्सन’ में रॉन पैजेट की कविताएँ

रंग भरने की कला आती हो तो रंगों में कविता कैसे उभरती है, इसका जीता-जागता उदाहरण है जिम जारमुश् की फ़िल्म ‘पैटर्सन’, जिसका नायक एक बस ड्राइवर और एक कवि होने के साथ-साथ ही अपने ही पसंदीदा कवि की कल्पना का एक अंग भी है। इसी फ़िल्म पर पिछले दिनों पोषम पा के पॉडकास्ट ‘अक्कड़ बक्कड़’ में बातचीत की गई और अभी हाल ही में हमें इस फ़िल्म में आयी और रॉन पैजेट द्वारा लिखी गईं कविताओं के अनुवाद लाखन सिंह जी द्वारा प्राप्त हुए। ज़रूर पढ़ें!

अक्कड़ बक्कड़, एपिसोड 4: Paterson

रंग भरने की कला आती हो तो रंगों में कविता कैसे उभरती है, इसका जीता-जागता उदाहरण है जिम जारमुश् की फ़िल्म 'पैटर्सन', जिसका नायक एक बस ड्राइवर और एक कवि होने के साथ-साथ ही अपने ही पसंदीदा कवि की कल्पना का एक अंग भी है।

फ़िल्म और उसमें निहित कविता का सहज अज़ीज़, पुनीत कुसुम और आनन्द प्रिया पर क्या प्रभाव रहा, सुनिए उन्हीं की बातचीत के ज़रिए, अक्कड़-बक्कड़ के चौथे एपिसोड में।

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